गुड़ी पड़वा क्या हैं इस पर्व को क्यों और कैसे मानते हैं

Gudi Padwa

गुड़ी पड़वा चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता हैं चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही हिन्दू नव वर्ष का आरंभ माना जाता हैं “गुड़ी” का अर्थ “विजय पताका” होता हैं।

पिछले पेज पर हमने नवरात्रि का त्यौहार क्यों मनाया जाता हैं कि सम्पूर्ण जानकारी दी हैं यदि आप नवरात्रि की जानकारी पढ़ना चाहते हैं तो इस पोस्ट को जरूर पढ़ें।

चलिए नीचे गुड़ी पड़वा का त्यौहार क्यों और कैसे मनाया जाता हैं इसकी सम्पूर्ण जानकारी विस्तृत पढ़ते हैं।

गुड़ी पड़वा

गुड़ी पड़वा के दिन को हिन्दू नव संवत्सरारम्भ माना जाता है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा या उगादि (युगादि) कहा जाता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि ‘युगादि‘ शब्द बनता हैं।

इस दिन हिन्दु नववर्ष का आरम्भ होता है। ‘गुड़ी’ का अर्थ ‘विजय पताका’ होता है।

कहा जाता हैं कि ब्रह्माजी जी ने गुड़ी पड़वा के दिन ही सृष्टि की रचना की थी इसी वजह से इस तिथि को ‘नवसंवत्‍सर’ भी कहा जाता है।

महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करते हुए इसी दिन “पंचाग की रचना की थीं इसलिए सनातन धर्म में गूडी पड़वा विशेष महत्व रखता हैं।

महाराष्ट्र में गुड़ी लगाया जाता है इसके लिए एक बांस की लकड़ी लेकर उसके ऊपर चांदी, तांबे या पीतल का कलश उलटा कर रखा जाता है और केसरिया रंग या रेशम के कपड़े से इसे सजाया जाता है।

इसके बाद गुड़ी को गाठी, नीम की पत्तियों, आम की डंठल और लाल फूलों से सजाया जाता है। गुड़ी को किसी ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है जिससे उसे दूर से भी देखा जा सके।

2021 में गुड़ी पड़वा कब हैं?

अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 2021 में गूडी पड़वा का त्यौहार 13 अप्रैल दिन मंगलवार को मनाया जाएगा इसी दिन चैत्र नवरात्रि का प्रारम्भ होता हैं।

गुड़ी पड़वा का पर्व कैसे मनाते हैं?

हिन्दू मराठी धर्म के लोग इस दिन गुड़ी का पूजन करते हैं और अपने घर के दरवाजे पर आम के पत्तों से बनी बंदनवार बाधते हैं।

दरवाजे में बंदनवार बाधने के पीछे यही मान्यता हैं कि बंदनवार घर में सुख-समृद्वि व खुशियां लेकर आती हैं।

पूरनपोली नाम का व्यंजन इस पर्व का प्रमुख व्यंजन हैं गुड़ी पड़वा पर्व की खुशी में विभिन्न क्षेत्रों में विशेष प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं।

गुड़ी पड़वा का पर्व मुख्य रूप से महाराष्ट्र के लोग हिन्दू नववर्ष  शुरू होने की खुशी में मनाते है, महाराष्ट्र में इस पर्व के दिन श्री खंड विशेष रूप से मनाया जाता हैं और इस दिन आंध्रप्रदेश में पच्चड़ी को प्रसाद के रूप में बाटने की परंपरा हैं।

माना जाता है कि खाली पेट पच्चड़ी के सेवन से चर्म रोग दूर होने के साथ-साथ स्वास्थ्य बेहतर होता है।

मान्यता हैं कि स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए गुड़ी पड़वा के दिन नीम की कोमल पत्तियों को गुड़ के साथ खाने की परंपरा हैं इससे सेहत तो ठीक होती हैं उसके साथ रिश्तों की कड़वाहट भी मिठास में बदल जाती हैं।

  • प्रातःकाल स्नान करने के बाद गुड़ी को सजाया जाता है।
  • लोग अपने घरों की सफ़ाई करते हैं
  • गांवों के लोग अपने घरों में गोबर से घर की लीपाई-पुताई करते है।
  • इस दिन अरुणोदय काल के समय अभ्यंग स्नान अवश्य करना चाहिए।
  • सूर्योदय के तुरंत बाद गुड़ी की पूजा का नियम है।
  • चटख रंगों से रंगोली बनाई जाती हैं साथ ही फूलों से घर को सजाया जाता है।
  • इस दिन आम तौर पर मराठी महिलाएं नौवारी (9 गज लंबी साड़ी) पहनती हैं।
  • मराठी पुरुष केसरिया या लाल पगड़ी के साथ कुर्ता-पजामा या धोती-कुर्ता पहनते हैं।
  • इस दिन नए वर्ष का भविष्यफल सुनने-सुनाने की भी परंपरा है।
  • गुड़ी पड़वा पर श्रीखंड, पूरन पोली, खीर आदि पकवान बनाए जाते हैं।
  • शाम के समय लोग लेजिम नामक पारंपरिक नृत्य भी करते हैं।

गुड़ी पड़वा का महत्व

गुड़ी पड़वा के पर्व से बहुत सी चीजे जुड़ी हुई हैं। चलिए उनमें से कुछ विशेष को आज पढ़ते हैं।

  1. भगवान राम 14 वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या वापस आए इसी खुशी की याद में कुछ लोग गुड़ी पड़वा का पर्व मनाते हैं।
  2. मान्यता है कि गुड़ी लगाने से घर में सुख समृद्धि आती है।
  3. छत्रपति शिवाजी की विजय को याद करने के लिए भी कुछ लोग गुड़ी लगाते हैं और यह पर्व धूमधाम से मनाते हैं।
  4. सम्राट शालिवाहन द्वारा शकों को पराजित करने की ख़ुशी में लोगों ने अपने घरों पर गुड़ी को लगाया और इस पर्व को सेलिब्रेट किया।
  5. मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने इस दिन ब्रह्माण्ड की रचना की थी। इसीलिए गुड़ी को ब्रह्मध्वज और इन्द्र-ध्वज के नाम से भी जाना जाता है।
  6. गुड़ी को धर्म-ध्वज भी कहते हैं अतः इसके हर हिस्से का अपना विशिष्ट अर्थ है–उलटा पात्र सिर को दर्शाता है जबकि दण्ड मेरु-दण्ड का प्रतिनिधित्व करता है।
  7. किसान रबी की फ़सल की कटाई के बाद पुनः बुवाई करने की ख़ुशी में इस त्यौहार को मनाते हैं। अच्छी फसल की कामना के लिए इस दिन वे खेतों को जोतते भी हैं।
  8. हिन्दुओं में पूरे वर्ष में साढ़े तीन मुहूर्त बहुत शुभ माने जाते हैं। ये साढ़े तीन मुहूर्त हैं– गुड़ी पड़वा, अक्षय तृतीया, दशहरा और दीपावली को आधा मुहूर्त माना जाता है।

गुड़ी पड़वा की कहानी

गुड़ी पड़वा पर्व पर पौराणिक ग्रंथों में कई कहानियों का उल्लेख मिलता हैं उनमें से में आपको 2 प्रचलित कहानी बताऊंगी।

पहली कहानी भगवान श्रीराम और बाली की हैं।

जब भगवान विष्णु ने भगवान श्रीराम का अवतार लिया था तब सीता माता का पता लगाते हुए दक्षिण दिशा की ओर गए दक्षिण दिशा में उनकी भेंट हनुमानजी और सुग्रीव से हुईं।

तब सुग्रीव ने अपनी कहानी श्रीराम को सुनाई कि कैसे उनके ही बड़े भैया बाली ने उनके साथ इतना अत्याचार किया तब श्रीराम ने कहा मैं दुष्ट बाली को उसके पापों की सजा जरूर दूँगा।

मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री राम ने बाली के अत्याचारों व कुशासन से सुग्रीव को मुक्ति दिलाई थी। इसी खुशी में हर घर में गुड़ी यानि कि विजय पताका फहराई गई। यह परंपरा तभी से कई स्थानों पर आज तक जारी है।

गूडी पड़वा पर्व से जुड़ी एक और कहानी है – जो शालिवाहन शक से जुड़ी हुई है।

गुड़ी पड़वा की तिथि पर शालिवाहन शंक भी आरंभ हुआ था। ऐसा माना जाता हैं कि – शालिवाहन नामक एक कुम्हार का लड़का था जो मिट्टी के बर्तन बनाता था।

शत्रु उसे बहुत परेशान करते थे अकेले होने के कारण वो शत्रुओं से युद्ध करने में सक्षम नहीं था उसके दिमाक में एक विचार आया और एक दिन उसने मिट्टी के सैनिकों की सेना तैयार की।

जब मिट्टी के सैनिकों की सेना तैयार हो गई तब उसने उन सैनिकों पर जल छिड़क कर प्राण डाल दिए।

कहाँ जाता हैं कि जब शत्रु उससे युद्ध करने आए तो इसी मिट्टी की सेना की मदद से उसने शक्तिशाली शत्रुओं का नाश किया और दुश्मनों को पराजित किया।

शालिवाहन की शत्रुओं पर विजय प्राप्त की इसी विजय के प्रतीक स्वरूप शालिवाहन शक का भी आरंभ हुआ। इसी विजय के उपलक्ष्य में गुड़ी पड़वा का यह पर्व आजतक मनाया जाता है।

जरूर पढ़िए :

इस पेज पर आपने गुड़ी पड़वा पर्व की जानकारी पढ़ी, उम्मीद हैं आपको पसंद आयी होंगी।

यदि आपको यह आर्टिकल पसंद आया हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर शेयर जरूर कीजिए।

Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.