हृदय

हृदय की संरचना, कार्य, कोष्टक, कपाट

नमस्कार दोस्तों यदि आप मानव शरीर के हृदय के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो आप सही जगह आए हैं क्योकि इस पेज के माध्यम से हम आपको मानव हृदय की जानकारी विस्तार पूर्वक दी हुई है।

पिछली पोस्ट में हमने मानव शरीर के पाचन तंत्र की सम्पूर्ण दी हुई है यदि आपने वह पोस्ट नही पढ़ी हैं तो उसे जरूर पढ़े।

चलिए मानव शरीर के हृदय की संरचना के बारे में विस्तार से पढ़ते हैं।

हृदय की परिभाषा

यह हृदयावरण (Pericardium) नामक थैली में सुरक्षित रहता हैं इसका का कुल वजन 375 ग्राम होता हैं।

यह शरीर का सबसे व्यस्त अंग हैं यह 1 मिनट में 72 बार धड़कता हैं तथा बच्चों का हृदय 1 मिनट में 102 बार धड़कता हैं जो कि 1 मिनिट में लगभग 500 मिली लीटर रक्त को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुंचाता हैं।

मनुष्य का हृदय 4 कोष्ठकीय होता हैं जो कि पसलियों के अंदर बाएं तरफ एवं द्रव पदार्थ के अंदर स्थित होता हैं। अगले भाग में एक दायां आलिंद एवं बायाँ आलिंद तथा हृदय के पिछले भाग में एक दायां निलय तथा एक बायाँ निलय होता हैं। दाएं आलिंद एवं दाएं निलय के बीच त्रिवलिनी कपाट होता हैं। बाए आलिंद एवं वाएँ निलय के बीच द्विवलनी कपाट होता हैं

हृदय की गतिशीलता एवं हृदय स्पंदन

एक स्वस्थ मनुष्य का हृदय 72 से 75 बार एक मिनट में धड़कता है। हृदय के स्पन्दन की यह गति कम भी हो सकती है और अधिक भी हर एक सपन्दन के साथ सर्वप्रथम दोनों एट्रियम का और उसके बाद दोनों वेन्ट्रिकल्स संकुचन होता है। संकुचन के बाद दोनों एक साथ शिथिल होते है। हृदय में यह स्पन्दन आधीवन निरन्तर चलता ही रहता है।

जब हृदय के कार्य करते समय जैसे ही दोनों वेन्ट्रिकल्स में संकुचन होता है, वैसे ही हृदय का एपेक्स छाती की दीवार से टकराता है। इससे इसकी ध्वनि उत्पन्न होती है। उसी से हम हृदय की धड़कन या स्पन्दन के रूप में सुनते तथा अनुभव करते है।

बड़ो की तुलना में बच्चों में हृदय के स्पन्दन की गति अधिक तीव्र होती है। हृदय के स्पन्दन की गति को अनेक कारक प्रभावित करते है। जैसे कि व्यक्ति की आय उसकी शारिरिक एवं मानसिक स्थिती इत्यादि।

जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है वैसे-वैसे उसके हृदय के स्पन्दन की गति भी क्रमशः कम होती जाती है। तीव्र संवेग जैसे क्रोध अत्यधिक खुशी इत्यादि में हृदय की धड़कन अत्यधिक तेज हो जाती है।

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हृदय के कार्य

  • यह एक पम्प की तरह कार्य करता है जो खून को अन्दर खींचता है तथा धमनियों के द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में पहुॅचता है।
  • हृदय शरीर के सभी हिस्सों से उघ्र्व महाशिरा तथा निन्म महाशिरा के द्वारा अशुद्ध खून की दॉए एट्रियम में इकट्ठा करता है।
  • पूरी तरह से भर जाने पर दॉयें एट्रियम में यंकुचन होता है और रक्त दॉए वेन्ट्रिकल मे आ जाता है।
  • इस प्रक्रिया के बाद ट्राइकस्पिड वालव बन्द हो जाता है।
  • इसके बाद दायेें वेन्ट्रिकल के संकुचित होने पर रक्त पल्मोनरी वाल्व से होकर फुफ्फसीय धमनी आगे जाकर उपशाखाओं में विभक्त हो जाती है।
  • जिसे दॉयी एवं बॉयी फुफ्फसीय धमनी कहा जाता है। इन धमनियों का कार्य है अशुद्ध रक्त को शुद्ध करने के लिए फुफ्फसो तक ले जाना।
  • फेफड़ों से शुद्ध रक्त चार फुफ्फसीय शिराओं के माध्यम से हृदय के बॉयी एट्रियम में संकुचन की क्रिया होती है।
  • धक्के के साथ बॉयें एट्रियों वेन्ट्रिकुलर वाल्व से होते हुए बॉये वेन्ट्रिकल में आता है। इसके बाद एट्रियों वेन्ट्रिकुलर वाल्व बन्द हो जाता है।
  • इसके बाद बॉया वेन्ट्रिकल संकुचित होता है जिसके कारण शुद्ध रक्त महाधमनी में पहुॅचता है।
  • महाधमनी शुद्ध रक्त को सम्पूर्ण शरीर के अंगो तक पहुॅचाने का कार्य करता है।

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हृदय की संरचना

यह एक गुलाबी रंग का शंक्वाकार अन्दर से खोखला मांसल अंग होता है यह शरीर के वक्ष भाग के वक्ष भाग में फेफडो के बीच स्थित होता है।

यही रूधिर वाहिनियॉ रक्त को पूरे शरीर में ले जाती है। तथा फिर इसी से वापस लेकर आती है। सामान्यत: मनुष्य शरीर में रक्त की मात्रा 5-6 लीटर होती है।

एक अन्य मत के अनुसार मनुष्य के शारीरिक भाग का 20वॉ भाग रक्त होता है। रक्त पूरे शरीर में दौडता रहता है। परिसंचरण तत्रं में मुख्य रूप से हृदयए धमनी व शिरा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

हमारा हृदय एक पम्पिंग मशीन की तरह कार्य करता है जो अनवरत अशु़द्ध रक्त को फेफडो में शुद्ध करने तथा फिर शुद्ध रक्त को पूरे शरीर में भेजता है।

हृदय भित्ति की तीन परते

  • पेरिकार्डियम
  • मायोकार्डियम
  • एण्डोकार्डियम
पेरिकार्डियम

यह दो कोषो से मिलकर बना है। बाहरी कोष तन्तुमय ऊतकों से निर्मित होता है तथा आन्तरिक रूप से सीरमी कला की दोहरी परत की निरन्तरता में पाया जाता है।

बाहरी तन्तुमय को ऊपर की ओर हृदय की बडी रक्त व लिशओं के टुनिका एड्वेन्टिशिया केद साथ निरन्तरता में होता है तथा नाचे की ओर डायाक्राम में लगा हुआ होता है।

सीरमी कला की बाहरी परत जिसे’’ पार्शिवक पेरिफार्शियम कहा जाता है। यह तन्तुमय कोष को आस्तरित करने का कार्य करती है।

अन्तरोगी पेरिकार्डिम हृदय पेशी से चिपटी हुयी होती है तथा पार्शिवक पेरिकार्डियम की निरन्तरता मे होती है।

मायोकार्डियम

यह एक विशिष्ट प्रकार की हृदयपेशी से निर्मित होती है। यह पेशी केवल हृदय में ही पायी जाती है। इसमें दो तन्तु पाये जाते है। वे अनेच्छिक वर्ग के होते है।

मायोकार्डियम की मोटाई सब जगह एक जैसी नही होती है। शिखर भाग पर यह सर्वाधिक मोटी तथा आधार की ओर पतली होती है जबकि बाये निलय में अपेक्षाकृत मोटी होती है क्योंकि बॅाये निलय का कार्यभार अघिक होता है। मायोकार्डियम आलिन्दों में बहुत ही पतली होती है।

एण्डोकार्डियम

हृदय भित्ति की सबसे भीतरी परत एण्डाकार्डियम इसका निर्माण चपटी कला कोशिकाओं से होता है। इस परत से हृदय के चारों कक्ष एवं कपाट आच्छदित रहते है।

जरूर पढ़े – हिंदी व्याकरण

हृदय के कोष्ठक

दायें एवं बायें भागों मे बॅटा हुआ होता है। यह विभाजनपरक पेशी पर (septum)के द्वारा होता है। ये दायें एवं बॉये भाग दोनों एक दूसरे से पूरी तरह अलग होते है।

हृदय के दायें भाग का संबंध अशुद्ध से तथा बायें भाग का संमंध शुद्ध रक्त के लेन-देन से होता है दायॉ एवं बायॉ भाग फिर से अनुप्रस्थ पर से विभक्त होता है जिससे एक ऊपर एवं नीचे का भाग बनता है। इस प्रकार हृदय का समस्त आन्तरिक भाग चार कक्षो में विभाजित हो जाता है।

बायीं ओर के दोनो कक्ष अर्थात बायॉ आलिन्द एवं बायीं निलय एक छिद्र द्वारा आपस मे सम्बद्ध होते है।

ठीक इसी प्रकार की व्यवस्था बॉयी तरफ होती है अर्थात् दायॉ आलिन्द एवं दायॉ निचल भी यह एक छिद्र द्वारा आपस मे सम्बद्ध रहते है इन छिद्रो पर वाल्व पाये जाते है। ये वातव इस प्रकार से लगे हुये होते है कि रक्त मात्र आलिन्द मे से निलय में तो जा सकता है किन्तु वापस लौट कर नही आ सकता।

रक्त को लाने एवं ले जाने वाली रक्त नलिकायें भी अपने से संबन्धित कोष्टक (कक्ष) में ही खुलती है।

हृदय के निम्न चार कोष्ठक होते हैं

  • दायॉ आलिंद:- दायी ओर ऊपरी कक्ष
  • दायॉ निलय:- दायी ओर का निचला कक्ष
  • बायॉ आलिन्द:- बॉयी ओर का ऊपरी कक्ष।
  • बायॉ निलय:- बॉयी ओर का नीचे कक्ष।
दायॉ आलिन्द

हृदय के इय भाग मे सम्पूर्ण शरीर का ऑक्सीजन रहित अशुद्ध रक्त आकर इकट्ठा होता है। उध्र्वमहाशिरा शरीर के ऊपरी हिस्से से तथा निम्न महाशिरा निचले हिस्से से अशुद्ध रक्त को दॉयें आलिन्द में पहुॅचाने का कार्य करती है।

इस कक्ष की शिलिया एवं पतली होती है क्योंकि इसे रक्त को पम्प करने का काम ज्यादा नही करना होता है। इस कक्ष का मुख्य कार्य केवल खून को गृहण करने का है।

दायॉ निलय

हृदय का दूसरा कक्ष है दायॉ निलय  होता हैं दायां निलय में अशुद्ध रक्त के पहुॅचने बाद के यह एट्रियॉ वेन्ट्रिकल छिद्र से होते हुए दायें वेन्ट्रिकल में आता है और वहॉ से फुफ्कुसीय धमनियों के द्वारा फेफड़ो में शुद्ध होने के लिए चला जाता है।

नोट:- फुफ्कुसीय धमनी के अलावा अन्य सभी धमनियो मे शुद्ध रक्त ही प्रभावित होता है। दायें निलय की शिरियॉ दॅाये एट्रियम की तुलना मे अधिक मोटी होती है क्योंकि इसे रक्त को पम्प करने का कार्य अपेक्षाकृत अधिक करना पडता है।

बायॉ आलिन्द

बायॉ आलिन्द हृदय की बायें भाग का ऊपर वाला कक्ष है। आकार की दृष्टि से चर दायें एट्रियम से थोड़ा से छोटा होता है। दायें एट्रियम की तुलना में इसकी भित्तियॉ भी थोड़ी मोटी होती है। इयमे चार फुफ्कुसीय शिरायें खुलकर शुद्ध रक्त को बायें एट्रियम तक ले जाने का कार्य करती है।

बायॉ निलय

हृदय का चौथा कक्ष बायॉ निलय है। यह भाग का निचला तथा हृदय का सभी कक्षो में सर्वाधिक बड़ा कक्ष है। इसकी भित्तियॉ शेष सभी कक्षो की अपेक्षा मोटी होती है। इसमें महाधमनी नामक एक छिद्र होता है, जिससे महाधमनी निकलकर शरीर के विविध भागों मे रक्तापूर्ति का कार्य करती है।

जैसे की बायें एट्रियम मे संकुचन होता है शुद्ध रक्त बायें वेन्ट्रिकल में आ जाता है। बायें वेन्ट्रिकल के संकुचित होते ही शुद्ध रक्त महाधमनी के छिद्र को खोल देता है और उसी मे से होकर वह प्रभावित होता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि बायॉ निलय शरीर के सभी भागो में शुद्ध रक्त पहुचाने मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।

हृदय के कपाट

वस्तुत: हृदय मे रक्त प्रवाह गलत दिशा मे न हो सके इस हेतु ही कपाठ या वाल्व होते है।

हृदय मे मुख्य रूप से चार वाल्व होते है।

  • टाइकस्पिड वाल्व
  • माइटल वाल्व
  • पल्मोनरी वाल्व
  • एऑटिकल वाल्व
टाइकस्पिड वाल्व

दायें आलिन्द तथा बायें निलय के बीच में स्थित छेद , जिसमे ढॅाचा एट्रियोवोन्ट्रिकुलर छिद्र कहा जाता है, उसके वाल्व को ट्राइकस्पिड या जिकपर्दी वाल्व कहते है। इस वाल्व मे तीन त्रिकोण के आकार वाले कास्पस पाये जाते है।

वाल्व के इन अस्पस का एट्रियेवेन्द्रिकुलर छेद के ऊपर पूरी तरह से नियंत्रण होता है आलिन्द मे संकुचन के कारण खून कस्पस को धक्का देता है और वेन्ट्रिकल मे पहॅुचता हैं।

इस प्रक्रिया के ठीक बाद ही कस्पस बन्द हो जाते है और ठीक इसी क्षण क्षपिलरी केशियों में संकुचन हाने के करण ये कांर्डी टेन्डिनी पर खिंचाव डालती है, परिणामस्वरूप कस्पस आलिन्द में नही अकेले जाते है और खून वापस नहीं लौट पाता है।

माइटल वाल्व

बायें आलिन्द तथा दॉयें वेन्ट्रिकल के मध्य के बॉयें एट्रियोवेन्ट्रिकुलर छिद्र का कपाट द्विकपर्दी कपाट या माइट्रल वाल्व या बाइकस्पिटु वाल्व कहलाता है।

इसमे दो कस्पस (cusps) होने के कारण ही इसे द्विकपर्दी कपाट करा जाता है। इसकी संरचना भी ट्राइकस्पिटु वाल्व के समान ही होती है। इसका कार्य है – बायें वेन्ट्रिकल के संकुचित होने पर रक्त को बायें एट्रियम मे वापस न जाने देना।

पल्मोनरी वाल्व

दायें वेन्ट्रिकल एवं फुफ्कुसीय धमनी के बीच का वाल्व पल्मोनरी वाल्व या फुफ्कुसीय कपाट कहलाता है। इसे अर्द्धचन्द्राकार वाल्व के साथ जाना जाता है क्योंकि इसमें तीन अर्द्धचन्द्राकार कस्पस होते हैं।

एऑटिकल वाल्व

 महाधमनी कपाट बायें वेन्ट्रिकल एवं महाधमनी के मध्य स्थित होता है। रचना तथा कार्य की दृष्टि से यह पल्योनवरी वाल्व के समान ही होता है।

जरूर पढ़े –  गणित

आशा हैं कि आपको Htips की यह मानव हृदय की पोस्ट अच्छी लगी होगी यही आपको कुछ समझ नहीं आता हैं तो कमेंट में जरूर पूछे धन्यवाद।

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