वट सावित्री क्या हैं | सुहागनें वट सावित्री का व्रत क्यों करती हैं

Vat Savitri

वट सावित्री का व्रत भारतीय संस्कृति में ऐतिहासिक पर्व माना जाता है। हिन्दू धर्म में वट सावित्री का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता हैं।

हिन्दू धर्म में पति की लम्बी उम्र के लिए सौभाग्यशाली स्त्री बहुत से व्रत रखती हैं उन्हीं व्रत में से एक वट सावित्री का व्रत हैं जो सावित्री और सत्यवान की सच्ची प्रेम कहानी पर आधारित हैं।

चलिए वट सावित्री का व्रत क्यों किया जाता हैं विस्तार पूर्वक पढ़ते हैं।

वट सावित्री

वट वृक्ष का पूजन और सावित्री-सत्यवान की कथा का स्मरण करने के विधान के कारण ही यह व्रत वट सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

वट सावित्री का व्रत सुहागनें अपने पति की लम्बी आयु के लिए और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि के लिए एवं संतान प्राप्ति के लिए करती हैं।

भारतीय संस्कृति में वट सावित्री का व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका हैं। सावित्री का अर्थ वेद माता “गायत्री” और “सरस्वती” भी होता है।

वट सावित्री पूजा कब है

वर्ष 2021 में वट सावित्री का व्रत एवं पूजा 10 जून दिन गुरुवार को होंगी। वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन मनाया जाता हैं।

प्रतिवर्ष दो बार वट सावित्री का पर्व आता है पहला ज्येष्ठ मास की अमावस्या को उत्तर भारत की सुहागनें वट सावित्री का व्रत रखती हैं एवं दूसरा ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को दक्षिण भारत की सुहागिनें वट सावित्री व्रत करके धूमधाम से इस उत्सव को मानती हैं।

मान्यता हैं कि बरगद की जड़ों में ब्रह्मा जी, तने में भगवान विष्णु व डालियों व पत्तियों में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता हैं।

वट सावित्री पूजा विधि

वट सावित्री के दिन सभी सुहागिन महिलाएं 16 श्रृंगार करके अपने पति की लम्बी आयु के लिए वट सावित्री का व्रत रखती हैं और बरगद के वृक्ष की परिक्रमा करके धागा बाधती हैं एवं विधि से पूजा करती हैं।

ज्योतिषीयों के अनुसार, बरगद के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश तीनों भगवान का वास होता हैं इसलिए बरगद की पूजा करने से पति दीर्घायु होने के साथ उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती हैं।

चलिए वट सावित्री की पूजा विधि-विधान से पढ़ते हैं।

  • वट सावित्री के दिन प्रातःकाल घर की साफ सफाई करके शुद्ध जल से स्नान करें।
  • इसके बाद पवित्र जल गंगाजल से पूरे घर में जल का छिड़काव करें।
  • पूजा स्थल पर पहले रंगोली बना लें, उसके बाद अपनी पूजा की सामग्री वहां रखें।
  • अपने पूजा स्थल पर एक चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर उस पर लक्ष्मी नारायण और शिव-पार्वती की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित करें।
  • पूजा स्थल पर तुलसी का पौधा रखें।
  • सबसे पहले गणेश जी और माता गौरी की पूजा करें। तत्पश्चात बरगद के वृक्ष की पूजा करें।
  • बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें।
  • ब्रह्मा के वाम पार्श्व में सावित्री की मूर्ति स्थापित करें।
  • इसी प्रकार दूसरी टोकरी में सत्यवान
  • और सावित्री की मूर्तियों की स्थापना करें।
  • इन टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे रखें।
  • इसके बाद ब्रह्मा तथा सावित्री का पूजन करें।
  • अब सावित्री और सत्यवान की पूजा करते हुए बरगद की जड़ में पानी दें।
  • पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें।
  • वटवृक्ष में जड़ चढ़ाकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें।
  • बरगद के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें।
  • भीगे हुए चनों के साथ, नकद रुपए रखकर अपनी सास के पैर छूकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
  • वट वृक्ष की पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें।
  • इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का श्रवण करना न भूलें।
  • निर्धन गरीब स्त्री को सुहाग की सामाग्री दान दें।

वट सावित्री की कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति थे जिनके यहां कोई संतान नहीं थी अर्थात राजा अश्वपति संतान सुख से वंचित थे।

राजा अश्वपति ने संतान प्राप्ति के लिए विशाल यज्ञ करवाया। मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं एवं सावित्री देवी की पूजा की और अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा।

इसके बाद सावित्री देवी ने प्रकट होकर वर दिया कि राजन आपके यहाँ एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी। देवी के वरदान से राजा अश्वपति के घर में एक कन्या का जन्म हुआ।

राजा ने देवी के नाम पर ही अपनी पुत्री का नाम सावित्री रखा। सावित्री रूप रंग में बहुत ही सुन्दर थी जैसे सावित्री बड़ी होती गई उनकी खूबसूरती का निखार बढ़ता गया।

जब सावित्री जवान हुई तो बेहद रूपवान थी। सावित्री को योग वर नहीं मिल रहा था जिससे उनके पिता दुःखी थे।

राजा अश्वपति ने अपनी पुत्री सावित्री को स्वंम मंत्री और सेनाओं के साथ वर तलाशने भेज दिया सावित्री तपोवन में वर की तलाश में भटकने लगीं।

वन में साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे रुक्मि नामक उनके एक सामंत ने उनसे राजपाट छीन लिया था। द्युमत्सेन अपने पुत्र और पत्नी के साथ वन में रह रहे हैं। उनका पुत्र सत्यवान सत्यवादी और धर्मात्मा था।

द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री को उनसे प्रेम हो गया और सत्यवान भी सावित्री के रूपरंग को देखकर मोहित हो गए और सावित्री से सच्चा प्रेम करने लगें। सावित्री ने पति के रूप में सत्यवान का वरण किया।

जब सावित्री पति रूप में सत्यवान को वर चुनकर आयी तो उसी समय देवर्षि नारद प्रकट हो गए और उन्होंने राजमहल में सभी को बताया कि सत्यवान की शादी के 12 वर्ष पश्चात उनकी मृत्यु निश्चिय हैं।

यह सुनकर अश्वपति ने सावित्री से कहाँ की आप किसी दूसरे वर का चुनाव करें सत्यवान से आपकी शादी होना असंभव हैं लेकिन सावित्री नहीं मानी और पति सत्यवान और सास ससुर के साथ वन में रहने लगी।

नारदजी के बताए अनुसार की आपके पति की मृत्यु का समय करीब हैं। सावित्री ने वट सावित्री का व्रत रखना शुरू कर दिया और विधि विधान से वट सावित्री का व्रत करने लगीं।

विवाह के कुछ समय बाद अचानक सत्यवान को सिर में बहुत तेज दर्द हुआ तो सावित्री ने सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे बैठ कर अपनी गोद में सिर रखकर लिटा लिया और तभी सत्यवान के प्राण निकल गए।

सावित्री ने देखा कि यमराज सत्यवान की आत्मा को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं यह देखते ही सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पढ़ी।

सावित्री को अपने पीछे आता देकर यमराज ने कहाँ की हे पतिव्रता नारी तुम सिर्फ पृथ्वीलोक में अपने पति का साथ दे सकती हो इसलिए तुम वापिस लौट जाओ।

सावित्री ने यमराज से कहाँ जहाँ मेरे पति रहेंगे उन्हीं के साथ मुझे भी रहना हैं यहीं मेरा पत्नी धर्म हैं यमराज ने उनकी धर्मनिष्ठा और पतिव्रता देखकर प्रसन्न होकर बोले देवी मैं आपसे बहुत प्रश्न हूँ लेकिन आपके पति की आयु इतनी ही थी मुझे इन्हें अपने साथ लेकर ही जाना हैं।

यमराज ने सावित्री से कहाँ तुम्हारा पति धर्म देखकर मैं प्रश्नन हूँ इसलिए मैं तुम्हें तीन वरदान देता हूँ मागों तुम्हें क्या चाहिए। लेकिन वरदान प्राप्त करने के बाद आपको पृथ्वीलोक वापस लौटना पड़ेगा।

पहले वरदान में सावित्री ने अपने नेत्रहीन सास ससुर के आँखों की रोशनी वापिस लाते हुए लम्बी उम्र की कामना की सावित्री के सास ससुर की रौशनी वापिस आ गई।

सावित्री फिर भी अपने पति के साथ जा रही थी तो यमराज बोले देवी दूसरा वरदान माँगिए और पृथ्वी लोक पर वापस जाइए।

तब सावित्री ने दूसरा वरदान मांगा की उनके ससुर का खोया हुआ राजपाट वापस मिल जाए यमराज ने सावित्री को यह वरदान भी दे दिया और खोया हुआ राजपाट वापिश मिल गया।

फिर भी सावित्री यमराज के पीछे जा रही थी तब यमराज बोले देवी में आपको अंतिम वरदान देता हूँ इसके बाद आपको पृथ्वीलोक वापिश लौटना पड़ेगा तब सावित्री ने पति सत्यवान के 100 पुत्रों की माता होने का वरदान माँगा।

सावित्री ने यमराज से कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है। वरदान के जाल में फंसकर यमराज को सावित्री के पति सत्यवान के प्राण वापिस करने पड़े।

यमराज अंतध्यान हो गए और सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गई जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था।

यमराज ने चने के रूप में सत्यवान के प्राण लौटाए थे इसलिए वट सावित्री की पूजा के समय चना का भोग लगता हैं एवं प्रसाद अर्पित किया जाता हैं।

सत्यवान जीवंत हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल पड़े। दोनों जब घर पहुंचे तो देखा कि माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भिगोकर अंत में स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।

वट सावित्री पर्व की शुरुआत कैसे हुई?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सावित्री ने वट वृक्ष अर्थात बरगद के पेड़ के नीचे ही अपने मृत पति को जीवित किया था इसलिए इस व्रत का नाम वट सावित्री पड़ा।

वट सावित्री व्रत में सबसे अधिक महत्व बरगद के वृक्ष का होता हैं इसलिए इस दिन सुहागनें वट वृक्ष की पूजा करके अपने पति की लम्बाई आयु की कामना करती हैं।

वट सावित्री व्रत में क्या खाना चाहिए?

वट सावित्री का व्रत करवा चौथ के व्रत के जैसे ही रखा जाता हैं “निर्जला” अर्थात व्रत के दिन ना कुछ खाया जाता हैं ना पिया जाता हैं एकदम निर्जल होकर वट सावित्री का व्रत किया जाता हैं।

वट वृक्ष की पूजा में गुलगुले यानी कि पुए और चने का भोग लगता हैं सुहागनें पुए और चने को अपने आँचल में रख कर परिक्रमा करती हैं और बाद में इसी प्रसाद को अर्पण करके अपना व्रत तोड़ती हैं।

प्रसाद में काले चने, आम का मुरब्बा और खरबूजा और गुलगुले का भोग लगाकर प्रसाद वितरित किया जाता हैं।

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आज के इस पेज पर आपने एकनिष्ठ पतिव्रता नारी की सच्ची कहानी को पढ़ा जो सावित्री और सत्यवान के सच्चे प्रेम की कहानी हैं जो आपको जरूर पसंद आयी होगी।

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