दशहरा का पर्व क्यों मनाया जाता है

दशहरा का पर्व आश्विनी मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को आता हैं। “दशहरा पर्व को असत्य पर सत्य की जीत के रूप में मनाया जाता हैं।”

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चलिए इस पेज पर दशहरा का पर्व क्यों मनाया जाता हैं कि सम्पूर्ण जानकारी विस्तार से पढ़ते हैं।

दशहरा

दशहरा हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्यौहार हैं अश्विन अर्थात क्वार मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा का पर्व होता है।

भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी।

दशहरा को असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसलिए इस दशमी को ‘विजयादशमी’ के नाम से जाना जाता है।

दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है दूसरी चैत्र शुक्ल की एवं तीसरी और अंतिम कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा।

2023 में दशहरा कब है

वर्ष 2022 में दशहरा का पर्व 24 अक्टूबर दिन मंगलवार को बनाया जाएगा।

दशहरा क्यों मनाया जाता है

दशहरा का पर्व हमारे भारत देश में धूम-धाम से मनाया जाता है। इसे विजय दशमी भी कहा जाता है। नवरात्रि के समय 9 दिन मां दुर्गा की पूजा-अर्चना एवं उपासना करने के बाद दसवें दिन रावण का पुतला बनाकर उसका दहन किया जाता है।

दशहरा का संबंध त्रेतायुग से है। त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। चलिए इसकी पूरी कहानी विस्तार से पढ़ते और समझते हैं।

अयोध्या के राजा दशरथ थे कि तीन रानियां कौशल्या, कैकई एवं सुमित्रा थी। जिनके यहाँ कोई सन्तान नहीं थीं राजा दशरथ ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया जिसका प्रसाद ग्रहण करके तीनों रानियां गर्ववती हुईं।

महारानी कौशल्या के यहां मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने जन्म लिया जो भगवान विष्णु के अवतार थे, कैकई के यहां भरत हुए एवं सुमित्रा के यहाँ लक्ष्मण और सत्रुघ्न ने जन्म लिया लक्ष्मण शेषनाग के अवतार थे।

दशरथ ने अपनी पत्नी कैकई को 2 वरदान दिए थे और बोला था जब आपका मन हो मांग लेना उसी वरदान का फायदा उठाते हुए जब चारों राजकुमार बड़े हुए तो कैकई ने अपने 2 वरदान महराज से मांग लिए।

पहले वरदान में कैकई ने अपने पुत्र भरत का राज्याभिषेक माँगा और दूसरे वरदान में श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मांग लिया।

पिता के दिए हुए वचन के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम 14 वर्षों के लिए वनवास चले गए उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण भी उनके साथ गए।

एक कुटिया बना कर वो सभी वन में निवास करने लगें तभी वहां से रावण की बहन सूर्पनखा श्रीराम को देखकर मोहित हो गई और श्रीराम के सामने आकर विवाह का प्रस्ताव रखा।

श्रीराम ने सूर्पनखा को आदरपूर्वक बताया कि मैं अपनी पत्नी सीता को वचन दे चुकें हैं कि उनके अतिरिक्त किसी और से विवाह नहीं करेंगे इसलिए मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकता।

सूर्पनखा को लक्ष्मण जी दिखे तो वो लक्ष्मण जी के पास गई और विवाह करने की हठ करने लगी जब लक्ष्मण जी नहीं माने तो माता सीता को खाने लगीं तो गुस्से में आकर लक्ष्मण जी ने सूर्पनखा की नाक काट दी।

सूर्पनखा अपनी कटी नाक के साथ लंका के महाराज और उसके भाई रावण के पास गई और रोते हुए रावण से बोला कि मैं एक सुंदर स्त्री को देखकर आपके लिए लाने वाली थी लेकिन उसके देवर ने मेरी नाक काट दी तब रावण क्रोध में गया और ब्राम्हण का रूप रखकर छल से माता सीता का हरण करके श्रीलंका ले गया।

फिर राम भक्त हनुमानजी ने माता सीता की खोज की और सीता माता का पता लगाया इसके बाद श्रीराम और रावण का युद्ध हुआ और अंत में मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम ने दुष्ट रावण का वध कर दिया।

उसी दिन से आज तक दशहरा के दिन रावण के पुतले को जला कर बुराई पर अच्छाई की जीत बनाई जाती हैं।

दशहरा कैसे मनाया जाता है

दशहरा के दिन लोग शस्त्र-पूजा करते हैं और अपना नया कार्य प्रारम्भ करते हैं।
जैसे : अक्षर लेखन का आरम्भ, नया उद्योग आरम्भ, बीज बोना आदि।

माना जाता हैं कि “इस दिन जो कार्य आरम्भ किया जाता है उसमें विजय अवश्य ही प्राप्त होती है।”

प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे।

दशहरा के दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। एवं रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है।

दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है।

इस तिथि को शस्त्र पूजन होता है। दशहरा हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। हमारी भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है एवं शौर्य की उपासक है।

हमारे समाज में वीरता और जोश प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव मानाया जाता है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों – काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।

दशहरा नवरात्रि के बाद क्यों बनाया जाता हैं

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर नाम का एक बहुत ही बड़ा शक्तिशाली राक्षस था महिषासुर अमर होना चाहता था इसलिए उसने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या की।

महिषासुर की कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी प्रश्न हो गए और महिषासुर के समक्ष प्रकट होकर वरदान मांगने को कहाँ तब महिषासुर ने अपने लिए अमर होने का वरदान मांगा।

महिषासुर की ऐसी बात सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि इस सृष्टि में जो इंसान जन्म लेता हैं उसकी मौत निश्चित हैं इसलिए जीवन और मृत्यु को छोड़कर जो वरदान मांगना चाहो मांग सकते हो।

ब्रह्मा जी की यह बात सुनकर महिषासुर ने कहा ठीक हैं प्रभु आप मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मेरी मृत्यु ना तो किसी देवता के हाथ से हो, ना किसी असुर के हाथों से हो, ना किसी मानव के हाथ से हो, ना किसी दानव के हाथ से हो, अगर मेरी मृत्यु हो तो किसी स्त्री के हाथ से हो।

महिषासुर की यह बात सुनकर ब्रह्मा जी ने उसे तथास्तु बोलकर आशीर्वाद दे दिया ब्रह्मा जी के इस वरदान के बाद महिषासुर राक्षसों का राजा बन गया और अत्याचार करने लगा और प्रतिदिन उसके अत्याचार बढ़ते ही गए।

एक दिन महिषासुर ने देवता पर आक्रमण कर दिया जिससे देवता घबरा गए। सभी देवताओं ने एकजुट होकर महिषासुर का सामना किया लेकिन महिषासुर के सामने सभी देवता पराजित हो गए। और देवलोक पर महिषासुर का राज हो गया।

महिषासुर ने तीनों लोक में हाहाकार मचा रखा था। महिषासुर से देवलोक वापिस लेने के लिए और अपनी रक्षा करने के लिए सभी देवता और भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी और शिव ने अपनी शक्ति को मिलाकर आदि शक्ति की आराधना की।

भगवान विष्णु, भगवान शिव और ब्रह्मा जी के शरीर से एक दिव्य रोशनी निकली जिसने बहुत ही सुंदर देवी का रूप धारण कर लिया जिन्हें देवी दुर्गा और वैष्णों देवी नाम दिया गया।

देवी दुर्गा को देखकर महिषासुर देवी दुर्गा पर मोहित हो गया और देवी दुर्गा से शादी करने का प्रस्ताव देवताओं के सामने रखा।

देवी दुर्गा महिषासुर से शादी करने को मान गई लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी। देवी दुर्गा ने कहाँ की महिषासुर तुम्हें मेरे साथ युद्ध करना पड़ेगा और मुझ से जीतना होगा महिषासुर ने देवी दुर्गा की शर्त मान ली और युद्ध आरम्भ हो गया।

माँ दुर्गा ने नौ दिन तक महिषासुर का मुकाबला किया और दसवें दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया जिसके बाद लोगों को महिषासुर राक्षस से मुक्ति मिल गई।

तीनों लोक में हर्ष और सुख शांति का माहौल था क्योंकि माँ दुर्गा को विजय की प्राप्ति हुई थी इसलिए तब से आज तक हम सभी दशहरा या विजयदशमी का त्यौहार मनाया जाता हैं।

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