पर्यावरण क्या हैं इसके घटक, प्रकार और महत्व

सदियों से मनुष्य ने पृथ्वी और पर्यावरण को असीमित संसाधन माना है लेकिन कई परिवर्तन ने हमारे पर्यावरण को अनेक तरीकों से प्रभावित किया है।

इस आर्टिकल में हम आपको अपने पर्यावरण के बारे में बताएंगे कि पर्यावरण के क्या महत्व है और इसे आने वाले पीढ़ियों के लिए स्वस्थ रखने के लिए कैसे उपयोग करना चाहिए?

पर्यावरण क्या हैं

paryavaran

Environment शब्द फ्रांसीसी शब्द Environ से बना है जिसका अर्थ होता है घिरे हुए या इर्द-गिर्द और ment का अर्थ है क्रिया। कुल मिलाकर पर्यावरण या Environment जीव और प्रकृति के बीच की क्रिया है।

किसी जीव के चारों ओर फैली हुई दुनिया जिसने बार आता है और जिससे वह प्रभावित होता है उसे उसका पर्यावरण या वातावरण कहा जाता है। मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही मनुष्य का पर्यावरण के साथ संबंध रहा है। यह संबंध उसके जन्म से लेकर वर्तमान तक चार भागों में बांटा जा सकता है।

1. प्रथम चरण – इस चरण में मानव का प्रकृति के साथ सह अस्तित्व था मतलब इस चरण में प्रकृति ही मानव पर हावी रही जिस कारण पर्यावरण बहुत ही शुद्ध बना रहा।

2. द्वितीय चरण – इस चरण में मानव द्वारा कुछ हद तक प्रकृति पर विजय पाई गई फिर भी पूरी तरह से हावी ना होने पर पर्यावरण शुद्ध ही रहा।

3. तृतीय चरण – इस चरण में मानव ने प्रकृति पर पूरी तरह से विजय प्राप्त कर लिया और विकास की दिशा में अपने कदम बढ़ाए। इंसानों का प्रकृति पर नियंत्रण हो गया तथा वह प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग और दोहन करने लगा। जिसके कारण पर्यावरण में कुछ प्रदूषण तो उत्पन्न हुआ लेकिन मानव के स्वास्थ्य के लिए यह हानिकारक नहीं हुआ।

4. चतुर्थ चरण – इस चरण में इंसान ने प्रकृति पर पूरी तरह से नियंत्रण कर लिया। इसमें इंसान ने अपनी सुविधा के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों का बहुत ज्यादा उपयोग किया और प्रकृति की दशा ही उजाड़ दी। जिस कारण अभी प्रदूषण की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि पर्यावरण के संरक्षण की बात उठने लगी है।

इंसानों के लिए अनेक प्रकार के पर्यावरण होते हैं जैसे घर का पर्यावरण, व्यवसायिक पर्यावरण, राजनैतिक पर्यावरण इत्यादि। लेकिन हम सिर्फ प्राकृतिक पर्यावरण के बारे में बात करेंगे जैसे वायु, जल,‌ भूमि, पेड़ पौधे तथा अन्य जीव।

पर्यावरण के घटक

पर्यावरण के मुख्य रूप से दो कॉम्पोनेंट्स होते हैं –

1. जैविक घटक – जैविक घटक पर्यावरण के उस हिस्से को कहते हैं जिसमें जीवित प्राणी या पेड़ पौधे पाए जाते हैं। यह बदले में पर्यावरण के रखरखाव का ध्यान रखते हैं। उदाहरण के लिए पेड़ पौधे, इंसान और जंतु इत्यादि।

2. अजैविक घटक – अजैविक घटक पर्यावरण के उस घटक को कहते हैं जिसमें निर्जीव वस्तुएं और चीजें पाई जाती हैं। उदाहरण के लिए प्रकाश, वर्षा, जल, तापमान, वायुमंडलीय गैस, मौसम परिवर्तन इत्यादि।

पर्यावरण के प्रकार

paryavaran

पर्यावरण के मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं – 

1. प्राकृतिक पर्यावरण

वैसा पर्यावरण जो प्रकृति से मिलता है उसे प्राकृतिक पर्यावरण कहते हैं। जैसे कि जिस तालाब में मछली रहती है उसका प्राकृतिक पर्यावरण वह तालाब है।

तालाब में रहने वाले अन्य जीव जैसे कीड़े, मेंढक और अन्य जीव उस मछली के लिए भोजन हो सकते हैं। इस तरह से उस मछली को उस तालाब में जीने के लिए सभी सुविधाएं प्राप्त होंगी तो वह उसका पर्यावरण होगा।

2. मानव निर्मित पर्यावरण

वैसे पर्यावरण जो इंसानों के द्वारा बनाए गए हैं जैसे खेत, शहर, गांव, कस्बे, बांध इत्यादि। उदाहरण के लिए हम इंसान अपने द्वारा बनाए गए घरों में रहते हैं। जो हमारा पर्यावरण होता है। लेकिन यह पर्यावरण प्राकृतिक नहीं होता क्योंकि इसे इंसानों द्वारा ही बनाया जाता है।

इंसानों द्वारा बनाया गया पर्यावरण अधिक मात्रा में पदार्थ और ऊर्जा का उपयोग करता है और इसके लिए देखरेख, निगरानी और प्रबंधन की आवश्यकता होती है।

3. मानव संशोधित पर्यावरण

वैसा पर्यावरण जिसे इंसान प्राकृतिक पर्यावरण से संशोधन कर के बनाता है उसे मानव संशोधित पर्यावरण कहते हैं। उदाहरण के लिए नदी के जल को हम सीधी नहीं पीते हैं बल्कि उसे पीने के लिए पहले उसका शोधन करते हैं।

इस तरह से नदी का पानी तो प्राकृतिक है लेकिन उसमें मानव द्वारा परिवर्तन किए गए हैं जिससे वह मानव संशोधित पर्यावरण के अंतर्गत आता है। इसके अलावा बगीचे, अभयारण्य इत्यादि भी मानव संशोधित पर्यावरण के प्रकार है।

पर्यावरण के क्षेत्र

paryavaran

पर्यावरण के मुख्य रूप से चार क्षेत्र होते हैं –

1. स्थलमंडल

पृथ्वी की बाहरी परत जिस पर महाद्वीप, महासागर, पेड़ पौधे इत्यादि पाए जाते हैं वह स्थलमंडल कहलाती है। पृथ्वी के कुल भाग का 29% भाग पर स्थल तथा 71% भाग पर जल है।

2. जलमंडल

पृथ्वी का लगभग ¾ भाग पर जल मंडल का विस्तार है जिसमें सागर, महासागर, इत्यादि पाए जाते हैं। पृथ्वी पर उपस्थित जल की कुल मात्रा का 97.5% जल महासागरों में है जो खारा है। बची हुई जल की मात्रा 2.5% भाग ही मीठा जल है।

3. वायुमंडल

पृथ्वी के चारों ओर हजारों किलोमीटर की ऊंचाई तक फैले हुए गैसीय आवरण को वायुमंडल कहते हैं। वायुमंडल का 97% भाग 29 किलोमीटर की ऊंचाई तक सीमित है। वायुमंडल में अनेक प्रकार के गैस जैसे नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड इत्यादि पाए जाते हैं।

4. जैव मंडल

पृथ्वी का वह क्षेत्र जहां जल, स्थल और वायु तीनों मिलकर जीवन को संभव बनाते हैं उसे जैवमंडल कहते हैं। जैव मंडल पृथ्वी पर लगभग सभी जगह होता है जैसे स्थल पर मनुष्य, जंतु और जल में मछलियां, मेंढक और वायु में पक्षी इत्यादि।

पर्यावरण के कार्य

पर्यावरण के निम्नलिखित कार्य होते हैं।

1. संसाधनों की आपूर्ति प्रदान करता है।

पर्यावरण उत्पादन के लिए संसाधन प्रदान करता है। इसमें नवीकरणीय और गैर-नवीकरणीय दोनों संसाधन शामिल हैं।

उदाहरण : फर्नीचर, मिट्टी, जमीन आदि के लिए लकड़ी।

2. जीवन को बनाए रखता है।

पर्यावरण में सूर्य, मिट्टी, पानी और हवा शामिल हैं, जो मानव जीवन के लिए आवश्यक हैं। यह आनुवंशिक और जैव विविधता प्रदान करके जीवन को बनाए रखता है।

3. कचरे को समाप्त करता है।

संसाधन का उत्पादन और उपभोग करने से अपशिष्ट उत्पन्न होते हैं। यह ज्यादातर कचरे के रूप में होता है। पर्यावरण कचरे से छुटकारा पाने में मदद करता है।

4. जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाता है।

वातावरण जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाता है। मनुष्य प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेता है जिसमें नदियाँ, पहाड़, रेगिस्तान आदि शामिल हैं। ये जीवन की गुणवत्ता में सुधार करते हैं।

पारिस्थितिक तंत्र या पारितंत्र क्या है?

जीवमंडल के जीवो का एक दूसरे के साथ वातावरण से गहरा संबंध होता है। यह एक दूसरे से जुड़े रहते हैं जिससे वातावरण संतुलित हो पाता है। किसी भी एक के कम या विलुप्त हो जाने से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है।

जीवमंडल के विभिन्न घटक तथा उसके बीच ऊर्जा और पदार्थ का आदान-प्रदान सभी एक साथ मिलकर पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं। 

दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि सजीव वस्तु, निर्जीव वस्तु, प्राकृतिक संसाधन और मानव निर्मित संसाधन इत्यादि सभी मिलकर एक अनुकूल पर्यावरण का निर्माण करते हैं जिसमें जीवन संभव होता है उसे पारिस्थितिक तंत्र या पारितंत्र कहते हैं।

जीवन के लिए पर्यावरण का महत्व

paryavaran

जीव चाहे किसी भी प्रकार के हो उन्हें जीवन के लिए अच्छे पर्यावरण की आवश्यकता होती है। हम भूमि का उपयोग फसलों को उगाने के लिए करते हैं।

मिट्टी पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करती है। अगर मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी होती है तो उनमें उर्वरक को मिलाने की आवश्यकता होती है।

जलवायु तथा मौसम परिवर्तन की पहचान मुख्य रूप से तापमान, दाब और वर्षा से होती है। वायुमंडल की वायु सजीव को ऑक्सीजन प्रदान करती है जिसके बिना जीवन खतरे में पड़ सकता है।

इस तरह से पर्यावरण हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है पर्यावरण में मौजूद हर प्राकृतिक वस्तु हमारे जीवन के लिए जिम्मेदार है। अगर इनमें से कोई भी वस्तु ना हो तो हमारा जीवन बहुत कठिन या असंभव हो जाएगा।

भारत में पर्यावरण संबंधी कानून

पर्यावरण संबंधी कानून बनाने में भारत किसी भी देश से पीछे नहीं है भारत में इस संबंध में अब तक लगभग 200 कानून बन चुके हैं।

पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1982

इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण का संरक्षण और उसमें सुधार करना है। यह पूरे देश पर लागू होता है। इस अधिनियम में निम्नलिखित अधिकार शामिल किए गए हैं।

  • पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए योजना बनाना और उसे लागू करना।
  • पर्यावरण की गुणवत्ता के स्तर को निर्धारित करना।
  • ऐसे क्षेत्रों को नियंत्रित करना जिसमें उद्योग स्थापित नहीं किए जा सकते।
  • पर्यावरण का प्रदूषण करने वाली दुर्घटनाओं से सावधानी बरतने के लिए कार्यक्रम तैयार करना।
  • प्रदूषण पैदा करने वाले सभी पदार्थों और प्रक्रियाओं की जांच करना।

जरूर पढ़िए : ग्लोबल वार्मिंग

उम्मीद हैं आपको पर्यावरण की जानकारी पसंद आयीं होगीं

यदि आपको यह पोस्ट पसंद आयी हो तो दोस्तों के साथ जरूर शेयर कीजिए

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

error: Content is protected !!
Share
Tweet
Pin
Share